कभी चले थें
साथ साथ ....
एक मुक्कमल
हिंदुस्तान बनाने.....
एक इंक़लाब था,
एक जन सैलाब था ,
....मैं उन शहीदों की
कुर्बानी ढूंढ़ता हुँ
मैं
अपने हिंदुस्तान में
हिंदुस्तानी ढूंढ़ता हुँ .......
न मंदिर न मस्जिद ,
न हिन्दु , न मुस्लिम ,
न भगवा , न हरा ,
बस एक कोने में
चुप चाप
खड़ा खड़ा ,
अशफ़ाक़ और बिस्मिल की
कहानी ढूंढ़ता हुँ
मैं अपने हिंदुस्तान में हिंदुस्तानी ढूंढ़ता हुँ
शरण सुप्रीत
Comments
Amidst this pessimism we can olny hope for a optimistic change. :)
"राख कितनी राख हैं , चारों तरफ बिखरी हुई. ।
राख मे चिनगारियाँ ही देख अंगारे न दॆख । "