एक और नन्हा कदम, सफ़र रेडियो मयूर तक का !!

फ़रवरी २०१६, लगभग ४ साल लगातार नौकरी करने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे अब ज़िन्दगी कही खो सी गयी है | दोस्तों के लिए वक़्त नहीं होता था , मोहल्ले में किसी से मिलना भी नहीं हो पता था, दिन भर की थकान ने मानो आदत सी बना दी हो कि बस घर आओ, खाना खाओ और सो जाओ | यूँ कहूँ तो ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा मुझसे अलग हो चूका था | बचपन से ही बताया जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और मेरी सामाजिक ज़िन्दगी कुछ थी ही नहीं , थी तो बस नौकरी , नौकरी , और सिर्फ नौकरी | दूर के रिश्तेदारों से यूँ तो हमेशा मैंने दुरी बनाना ही सही समझा लेकिन नौकरी के चक्कर में पास के रिश्तेदार भी न जाने कब मुझसे दूर होते चले गये, पता ही नहीं चला | माँ और मैं अकेले ही रहते थे घर पर कुछ दीवारों और छतों के साथ लेकिन बातें अक्सर खुद से ही ज्यादा होती थीं वो भी बस सोने और जागने के दरमियाँ | ज़िन्दगी सही नहीं चल रही थी | शायद ये वो वक़्त था जब कुछ परिवर्तन अनिवार्य हो गया था |
              एक रोज़ जब सुबह मेरी नींद खुली तो दिल ने कुछ सन्देश सा भेजा मेरे दिमाग को | मैंने तुरंत फैसला ले लिया | अब मुझे कुछ दिनों तक नौकरी नहीं करनी थी, ज़िन्दगी के सफ़र में एक नन्हा कदम | डिजिटल उपकरणों का भी बहुत महत्व है, इस्तीफा पत्र मेल के द्वारा प्रेषित करने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा | अब पता लग रहा था ज़िन्दगी में आज़ादी क्यों ज़रूरी है और सामाजिक ज़िन्दगी क्या होती है , इसका भी एहसास अब होने लगा था | शाम में ठंडी हवाएं भी चलने लगी थीं और दोपहर की धुप में भी सुकून था | जाड़े का मौसम अभी ख़त्म नहीं हुआ था | दोस्त यारो के साथ वक़्त भी अच्छा गुजरता था | चाय की चुस्की अब पहले से ज्यादा अच्छी लगने लगी, ऑफिस की चाय से अलग होती थी ये चाय और अलग होती भी क्यों ना , आखिर दोस्तों के साथ चाय पीने का मज़ा ही कुछ और था | कई रिश्तेदारों से बात होती थी तो पता चलता था कि सबकी जिंदगी बहुत बदल गयी है | लेकिन ज़िन्दगी तो मेरी भी बदल रही थी | मैं बेरोजगार हो चूका था | कुछ दिनों बाद वक़्त गुज़ारना मुश्किल होने लगा | छपरा जैसे छोटे से शहर में आपको आसानी से अच्छी नौकरी भी नहीं मिलती | लेकिन एक बात तो बिलकुल स्पष्ट थी , अब मुझे बस नौकरी नहीं करनी थी, नौकरी के साथ साथ ज़िन्दगी भी जीना ज़रूरी था | उन्ही दिनों कौशिक भैया ने मुझे अभिषेक सर के बारे में बताया , रेडियो मयूर के बारे में बताया | रेडियो ! क्या वाकई !
            रेडियो शब्द सुनते ही कॉलेज के वो पुराने दिन याद आ गये | लखनऊ शहर में बहुत सारे रेडियो स्टेशन हैं और रात में काफी वक़्त रेडियो के साथ ही गुज़रता था | लेकिन क्या छपरा शहर में भी लोग रेडियो सुनते होंगे उतने ही उत्साह के साथ? खैर ये तो बाद की बात थी, मुझे पहले ये सोचना था कि क्या मुझे रेडियो से जुड़ना चाहिए या नहीं | दिमाग में कई बातें आपस में बैडमिंटन खेलने लगीं | एक बात ऐसी थी जो मैं हमेशा सोचता था कि अब तक जो भी पढाई करी है  वो शायद यहाँ काम नहीं आने वाला | वैसे अब तक जितनी भी नौकरिया मैंने करी थी वहां भी पढाई और क्वालिफिकेशन किसी काम तो आई नहीं थी | हाँ , मुझे लिखने का बड़ा शौक़ है | खली वक़्त में अक्सर कवितायेँ या कहानियां लिखने कि कोशिश करता रहता हूँ | यहाँ कुछ ख़ास था, यहाँ मेरे पास सिखने को बहुत कुछ मिल सकता था | लोगो के बिच अलग पहचान बन सकती थी | समाज के लिए कुछ करने का मौका मिल सकता था | और शायद ये वो नौकरी हो सकती थी जहाँ मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकता था, बाकि नौकरियों से बिलकुल अलग | शायद काम के साथ ज़िन्दगी  जीना और ज़िन्दगी जीते रहने के साथ काम करना, जैसा मैंने सोचा था वैसा ही होने वाला था | लेकिन इंसानी फ़ितरत के क्या कहने | सकारत्मक सोच बनाने से  पहले नकारात्मक ख्याल दिल और दिमाग में अक्सर घर कर जाते  हैं | मेरे साथ भी यही हुआ | बड़े बड़े रेडियो जॉकी जो हैं उनकी आवाज़ सुनने लगा एक बार फिर से | इस बार मकसद कुछ और ही था, मनोरंजन तो बिलकुल ही नहीं था | ख़ुद कि आवाज़ को सुनता और ऐसा लगता कि मैं शायद इसके लायक नहीं | इन्सान को अगर मौका मिले तो क्या कुछ नहीं कर सकता , बस खुद पर विश्वास होना चाहिए लेकिन धन्य है इंसानी फ़ितरत जो मौके को पहचानने में अक्सर देरी करा जाती है |
            7 अप्रैल २०१६, ये वो दिन था जब कर्पूरी भैया ने मुझे कॉल किया और कहा कि अभिषेक जी आये हैं तो ज़रा आ के मिल लो | उस दिन मेरी अभिषेक सर से पहली मुलाकात हुई | रणजीत भैया के दुकान पर हम मिले | दिमाग में एक बात बार बार आ रही थी , मैं कैसे रेडियो जॉकी बन सकता हूँ? लेकिन उसी दिमाग के किसी एक कोने से ये भी आवाज़ आ रही थी कि भाई मौका तो मिले, जी तोड़ कोशिश होगी फिर | अभिषेक सर भी शायद थोड़ी जल्दी में थें | उन्हें कलकत्ता जाना था शायद | उन्होंने मुझसे  रिज्यूमे माँगा और फिर एक बार  डिजिटल उपकरणों ने मेरा साथ दिया | मोबाइल से ही रिज्यूमे तुरंत मेल कर दिया | थोड़ी देर बात हुई , व्हाटसप्प नंबर भी एक्सचेंज हुआ और फिर शुरू हुआ एक लम्बे इंतजार का दौड़ |
           लगभग एक सप्ताह सोचता रहा कि क्या मुझे मौका मिल भी पायेगा या नहीं? इसी बिच कुछ रेडियो के प्रोग्राम्स भी सुनता रहा , कुछ  सिखने की कोशिश कर रहा था शायद | १३ अप्रैल को अभिषेक सर का मेसेज आया और उन्होंने कुछ ऑडियो क्लिप्स मांगे | ऑडियो क्लिप्स तो भेज दिया लेकिन दिमाग में नकारात्मक ख्याल अब भी अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं थें | कुछ देर बाद अभिषेक सर का मेसेज मिला कि वो बता देंगे हमे आगे क्या करना है अगले वर्कशॉप से पहले उसकी जानकारी भी मिल जाएगी | अब थोडा सुकून मिला था और बेचैनी  भी थी | वर्कशॉप कब होगा , कब रेडियो स्टेशन जाऊंगा , कैसे काम करते हैं वहां ..... बहुत सारे ख्यालो ने घेर लिया | लगभग एक महीने बाद ११ मई को पता चला कि अगले दिन रेडियो स्टेशन पहुचना है १२ बजे तक |
          १२ मई २०१६, रेडियो स्टेशन में मेरा पहला दिन | जब मैं रेडियो स्टेशन पंहुचा तो कुछ लोग पहले से ही वहां थें | विक्रम , पूजा , श्वेता | थोड़ी देर बाद कुछ और लोग आ गये | सुशांत सर से मेरी पहली मुलाकात उसी रोज़ हुई | उम्मीद से कहीं ज्यादा ही भाड़ी आवाज़ थी उनकी |  थोड़ी देर बाद अभिषेक सर भी आ गये | एक छोटी से ऑफिसियल मीटिंग हुई | स्टूडियो देखा , प्रोग्राम्स के बारे में जाना , कुछ लोगो से बातचित  हुई लेकिन ज्यादा वक़्त मैं खामोश ही था | कई सरे प्रोग्राम्स में से एक प्रोग्राम ने मुझे बहुत आकर्षित किया , "सुनना ज़रूरी है"| ये प्रोग्राम जानकारियों से भरा था और जानकारियां भी अपने मिटटी से जुडी हुई | पहला प्रोग्राम जिसकी रिकॉर्डिंग करनी थी "सुनना ज़रूरी है - भिखारी ठाकुर"| मुझे ट्रेनिंग नहीं मिली थी अब तक लेकिन छोटी छोटी और ज़रूरी चीज़े अभिषेक सर, सुशांत सर और पशुपतिनाथ अरुण सर ने बताया था |
          २० मई कि शाम थी जब मुझे रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया गया | आकाश सर और बलबीर सर भी छपरा आये हुए थें | रिकॉर्डिंग शुरू हुई और मेरी ट्रेनिंग भी | बहुत सारी चीज़े थीं सिखने को | मैंने अपने स्क्रिप्ट का कुछ हिस्सा रिकॉर्ड कराया और उसके बाद बलबीर सर ने कुछ और बारीकियों के बारे में बताया | अब मज़ा आने लगा था | हलाकि मेरी रिकॉर्डिंग उतनी अच्छी नहीं थी फिर भी आकाश सर और बलबीर सर ने बहुत प्रोत्साहित किया | सिखने का सिलसिला शुरू हो चूका था | सुशांत सर ने निलेश मिश्रा की एक रिकॉर्डिंग दी और कहा इसे हर रोज़ सुनो और अभ्यास करो | कई दिनों तक सुनता रहा और सीखता रहा लेकिन बलबीर सर की आवाज़ कानों में गूंजती रही | उनकी आवाज़ बिलकुल अलग है | मैंने सुशांत सर से बलबीर सर कीआवाज़ वाली रिकॉर्डिंग लिया और फिर उसे सुन कर ही अभ्यास करता रहा | दिन बीते , कुछ सुधर हुआ | अब रिकॉर्डिंग के समय कॉन्फिडेंस रहता था | लाइव शो कि भी तयारी चलने लगी |
          १७ जुलाई २०१६ को रेडियो मयूर का उद्घाटन हुआ | ये हम सभी के लिए बहुत बड़ा दिन था | अब रेडियो पर सीधा  प्रसारण होने लगा | कई लोग हमे हमारी आवाज़ से पहचानने लगे | ज़िम्मेदारी बढ़ गयी | ............................. TO BE CONTINUED !!

Comments

सुन्दर अभिव्यक्ति ,
Swati's Blogg said…
पुराने दिन याद आ गए।