..... ये भूकंप था !


मुझे वो दिन बहुत अच्छी तरह से याद है.. २५ अप्रैल २०१५! दोपहर का समय था, लगभग दो बजे थे! हर तरफ सिर्फ चीखें, इधर उधर भागते लोग, कुछ खून से सनी लाशें, अपनों को तलाशते लोग! सडकों पर दरारे आ गयी थीं, आकाश में पक्षी बेचैन नज़र आ रहे थे, गर्मी का मौसम लेकिन सूरज नज़र नहीं आ रहा था! बहुत ही भयानक मंज़र था ! और तभी एक बार फिर से धरती कापने लगी! बिजली के खम्बे हिलते रहे और फिर टूट कर ज़मीन को चूमने लगे! मोटरसाइकिलें अब स्टैंड पर टिकी नहीं रह सकती थीं! सामने जो दुकान था उसका सामान क्रिकेट की गेंद की तरह सड़क पर उछल कर अपनी नयी मंजिल तलाशने लगा! थोड़ा नीचे जो पतली सी नदी थी, उसमे समुन्द्र जैसी हलचल होने लगी! मकान टूट रहे थे! लोग एक दुसरे का हाथ थाम कर सँभालने की कोशिश कर रहे थे! ऐसा लग रहा था जैसे किसी बहुत बड़े समुद्र के बीच एक छोटी नाव फस गयी हो और समुन्द्र की लहरें उस नाव को खुद में समा लेने कि कोशिश कर रही हो!  ये भूकंप था! नेपाल के मुनग्लिंग चौराहे पे लोग फिर बेचैन हो गएँ! प्रलय आएगा एक न एक दिन, लेकिन अभी जो कुछ भी हो रहा था वो प्रलय से कम नहीं था! मानो प्रकृति ने निर्णय कर लिया था कि धरती का अंत आज ही करना है! इन्सान और इन्सान के कर्मो का फ़ैसला आज ही होना था!

थोड़ी देर बाद सब कुछ फिर से शांत हो गया! बिलकुल शांत! लोगों से सुना था कि इन्सान अपनी जिंदगी में शांति चाहता है लेकिन क्या ऐसी शांति? ये शांति बहुत ही डरावनी थी ! हर कोई बस एक दुसरे का चेहरा डर डर के देख रहा था, हर किसी के आँखों में दर्द, हर चेहरे पे मातम! ये डर, दर्द, मातम और नाजाने कितनी इंसानी भावनाओ ने आवाज़ का रूप लिया और हर तरफ से सिर्फ रोने की आवाज़े आने लगी! वो आवाज़ें आज तक मेरी कानो में गूंजती हैं! हर कोई बस उपरवाले से प्रार्थना करने में लगा था! मैं भी प्रार्थना करने के लिए अपने हाथ जोड़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन मेरा बायाँ हाथ उठ नहीं रहा था! मेरे कंधे की हड्डी टूट चुकी थी! मेरा बायाँ हाथ खून से सना था, खून जो मेरे सिर से निकल कर कान, आँख और गाल के रस्ते गले से हो कर छाती और हाथ की हथेली तक पहुँच रहा था! इतना सारा खून देख कर मुझे चक्कर आने लगा! शायद मेरे शारीर से खून भी बहुत ज्यादा बह चूका था इसलिए कमज़ोरी का भी एहसास हो रहा था! पीठ पर टंगा बैग बहुत भारी लग रहा था! धीरे धीरे मेरे शरीर पर मेरा नियंत्रण कम होने लगा था और फिर एक आवज़ सुनाई पड़ी, “आपका नाम भाइसाब?” मेरा नाम! कुछ देर अपने दिमाग पर ज़ोर डालने के बाद भी मुझे मेरा नाम याद नहीं आ रहा था! मेरा नाम क्या है? मैं कौन हूँ? मैं यहाँ कर क्या रहा था? मुझे कुछ भी याद नहीं था! कुछ भी नहीं! “मेरा नाम .......” कुछ और बोल पाता उससे पहले मेरी आवाज़ धीमे हो कर गायब हो गयी! मैं बेहोश हो गया !

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अच्छा लगा पढ़ के। शुभकामनाएं