अब बचपन बदल गया है!



“१०..०९..०८.... ..०४...०३...०२...०१.. आ रहा हूँ!” बस आँखें बंद कर एक उलटी गिनती होती थी और शुरू हो जाता था छुपन छुपाई का खेल! कोई दरवाज़े के पीछे छुपा होता, कोई पलंग के नीचे, कोई अकेला छुपा रहता तो कुछ साथ में रहते! “गोलू आइस पाईएस, भागो मत! मैंने तुम्हे देख लिया है! तुम चाचा के कमरे में हो !” याद आ रहा होगा आपको आपका बचपन! कितना मज़ा आता था ना! उत्साह और भी ज्यादा हो जाता जब सबसे पहले आप पकडे जाते थें और आपका एक साथी तब भी छुपा रहता था! चोर उसे ढूंड रहा होता है! आप उम्मीद करते थे कि वो आये और पीछे से चोर को पकड़े और बस ज़ोर से कहे “धप्पा”! इस उम्मीद में आप बार बार कहते रहते होंगे “छुपने वाले छुपे रहो, चोर तुम्हारे पास है”! बचपन के वो खेल! छुट्टियों में नानी के घर जाना और वहाँ परिवार के सारे बच्चों का एक साथ खेलना, वाकई छुट्टियाँ तो तब ही होती थी!



आज कल तो वक़्त ही नहीं है बच्चों के पास भी कि वो ऐसे खेल खेल सकें! भाई पढाई की भी तो बड़ी ज़िम्मेदारी है उनके नन्हे कंधो पर! मनोरंजन की ईच्छा हुई तो स्मार्टफ़ोन है ना! अब छुपन छुपाई, पकड़ा पकड़ी, गिल्ली डंडा, पिट्टो, विष अमृत और पहाड़ पानी जैसे खेल बहुत कम बच्चे खेलते दिखते हैं! साफ़ सफाई का भी बड़ा ध्यान है बच्चों को! मिट्टी से बचपन का जो रिश्ता था, वो टूट सा गया है! पहले तो दौड़ते भागते , कभी फिसलते कभी लड़खराते, गिरते और चोट भी लगती! लेकिन खेल खेल में वो चोट और दर्द सब सहने की हिम्मत और आदत होती! अब तो ज़रा सी चोट पर दवाइयां दी जाती हैं! वो बचपन जब सब के साथ खेलते खेलते सिखने को बहुत कुछ मिलता था, अब खो चूका है!



 तकनीक की दुनिया है! नन्हा बचपन अब कागज़ की कश्ती बनाना जाने ना जाने, स्मार्टफ़ोन पर उपलब्ध “गेम्स” के अगले लेवल पर जाना ज़रूर जानता है! कभी जो बचपन कागज़ के हवाई जहाज़ बनाता था आज टचस्क्रीन पर जहाज़ ख़ुद से उड़ाता है! शायद वक़्त की ही कमी है उसके पास! अब कौन बाहर जाए, दोस्तों को बुलाए, उनका इंतज़ार करे, फिर साथ में खेले और तब वापस आए! घर पर ही सब मिल जाता है अब तो, स्मार्टफ़ोन! खेलो जितना खेलना है, और फिर लग जाओ किताबों के साथ! अरे भाई, वो जो चार घर आगे अंकल रहते है न, उनके लड़के के साथ ही तो मेरी कम्पटीशन है! कहीं मैं खेलता रहूँ और वो ज्यादा पढ़ ले तो?
हर तरफ प्रतियोगिता लगी है! बच्चे ने बोलना शुरू क्या किया कलम पकड़ा दी गई! मैंने तो 2 साल के छोटे से बड़े मासूम से बच्चे को ट्यूइशन पढ़ते देखा है! सुना है बड़े बड़े शहरों में बच्चे प्रारंभिक विद्यालय में दाख़िले के लिए भी तयारी करते हैं! शायद बड़े शहरों ने छोटी सी जिंदगी से उसका बचपन चुरा लिया है! भविष्य में ना जाने और क्या क्या हो! आखिर इन सब का ज़िम्मेदार है कौन?
बच्चे तो बेचारे छोटे हैं, उन्हें क्या मालूम दुनियादारी! वो तो बस ख़ुद में मग्न रहते है! माँ बाबूजी ने कहा पढ़ो तो बस पढाई शुरू! और कम्पटीशन अपने आप उनके दिलो-दिमाग पर छाने लगता है! कम्पटीशन भी ज़रूरी है, शायद बहुत ज्यादा ज़रूरी है, लेकिन क्या इतने छोटे बच्चे को इस कम्पटीशन की दुनिया में ढकेल देना जायज़ है? मैं सिर्फ बड़े शहरों की बात नहीं कर रहा! हर जगह यही माहौल है! और इस माहौल में मैंने अपना बचपन नहीं गुज़ारा, बस इस बात की ख़ुशी है!

Comments

Swati said…
अपना बचपन याद आ गया आज
ए दिल बता बचपन कहाँ
Unknown said…
Love it😍 वो आये और पीछे से चोर को पकड़े और बस ज़ोर से कहे “धप्पा”!🤗
pratik mukul said…
Childhood revisited..... very nicely expressed
Anonymous said…
aasu agye bhai ankho me....ek dum fact likha h
Unknown said…
Dil to bachcha hai jee...😸
PA11 said…
We had seen many revolutions over time. We can put all those things together,right where they belong. #we_need_revolution
mayank said…
कोई लौटा दे वो बचपन ...
suprit said…
Thank you everyone
Srivastava Priya said…
So nice..mughe lga jaise i m reading a story frm book#Champa����
Karan kumar said…
Kaas! Vo bachpan wapas aa jaye...
Bachpan har kisi ki real loving yaadein hoti hain....always smile wali yadein
Kumar Gaurav said…
After reading, childhood revolves in front of eye and in the mind
Unknown said…
सच में बचपन याद आ गया....