राजशाही से लोकतंत्र तक, जनता अब भी परेशां है!

 १५ सितम्बर- अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस



राजा महाराजाओ के वक़्त भी क्या गज़ब की व्यवस्था रही होगी ना? राजा की इक्षा हुई अपने देश की सीमा कुछ और बढ़ाने की तो युद्ध के लिए निकल गए। ऐश-ओ-आराम में तकलीफ हुई तो सेवकों की संख्या बढ़ा दी। कोई आलिशान ईमारत खड़ी करनी हो तो जनता से मनचाहा लगान वसूल लिया। सिर्फ और सिर्फ राजा की इक्षा ही मायने रखती थी। जनता तो बस सेवक, या फिर गुलाम ही कह लें तो इतना भी ग़लत नहीं होगा। ख़ुद के लिए क्या चाहती है जनता इससे शायद ही राजा को फ़र्क पड़ता होगा। कभी कभी जनता के मन में राजा के प्रति आक्रोश भी आता होगा, और फिर शायद भरोसा ही ख़त्म हो जाता होगा।

जनता का देश के शासन पर भरोसा होना बहुत ज़रूरी है। बिन भरोसे के ना तो देश की सीमा सुरक्षित रह सकती है ना हीं वहाँ की प्रजा और ना हीं ख़ुद राजा। शायद इसी उद्देश्य से लोकतंत्र की कल्पना की गयी होगी जहाँ जनता के पास देश की सरकार चुनने का अधिकार हो और सरकार जनता के लिए काम करें। जनता सिर्फ़ सेवक ना रहे बल्कि देश की सरकार जनता की सेवक हो। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा “लोकतंत्र जनता का जनता द्वारा जनता के लिए किये जाने वाला शासन है”। क्या खुबसूरत कल्पना रही होगी लोकतंत्र की।

आज दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र है और कई देश ऐसे हैं जो दावा करते हैं कि उनके यहाँ भी लोकतंत्र है, उदाहरण के लिए अपना पड़ोसी मुल्क़ हीं देख लिजिये। लेकिन जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था की कल्पना की गयी थी, वैसी व्यवस्था कितने देशों में है ये तो अनुसन्धान का विषय है। मैं अमेरिका, रूस, इंग्लैंड स्वित्ज़रलैंड की बात नहीं करूँगा। भारतीय हूँ, भारत को समझता हूँ, भारत में रहता हूँ, भारत की बात करूँगा। हमारे देश में ९१ करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। इस हिसाब से हम भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कह सकते हैं। जनता अपनी इक्षा से अपने मताधिकार का प्रयोग कर सरकारें चुनती है। चाहे वो वार्ड कमिश्नर हो, गाँव का मुखिया हो, प्रदेश की सरकार हो या केंद्र अथवा देश की सरकार हो, सब के सब, छोटे से छोटे या बड़े से बड़े स्तर पर जनता हीं सर्वोपरी है। वाकई गज़ब की व्यवस्था है।

लेकिन क्या सिर्फ सरकार चुनना, मताधिकार होना हीं पूर्ण रूप से लोकतंत्र है? ना! चुनाव होना तो लोकतंत्र का एक अभिन्न हिस्सा मात्र है। लोकतंत्र को सही मायने में स्थापित करने की पूर्ण ज़िम्मेदारी जनता के द्वारा चुने गये उम्मीदवार की होती है। उसकी ख़ुद की मानसिकता लोकतांत्रिक होनी चाहिय। चुने हुए उम्मीदवार अक्सर भूल जाते हैं कि वो सिर्फ सेवक हैं, मालिक नहीं। जनता जो अधिकार देती है आपको उसका इस्तमाल सिर्फ और सिर्फ समाज और देश के विकास के लिए करना चाहिए, सत्ता के घमंड में इसका दुरूपयोग लोकतंत्र को घायल करती रहती है।

जब भारत के स्वतंत्रता का प्रस्ताव आया था तब तात्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल खुश नहीं थें। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि भारत उनके गुलामी से आज़ाद हो रहा था, बल्कि इसलिए भी क्यूंकि उन्हें अंदेशा था कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था अराजकता जैसी स्थिति ला सकती है। उनके अनुसार भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर धीरे धीरे आपराधिक दिमाग वाले, गुंडे और संघठित समूह काबिज हो जायेंगे। ज़रा सोचिये, लगभग ७५ साल पहले हीं उन्होंने भारत की भविष्यवाणी कर दी थी। आपको नहीं लगता आज हम उनके सम्मान में उनकी भविष्यवाणी को साकार करने में पूरी तरह से जुटे हुए हैं?

एक वक़्त, आज़ादी के बाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण को सम्पूर्ण क्रांति का आह्वाहन करना पड़ा। राष्ट्रकवि दिनकर जी ने कविता लिखा, “ सिंघासन ख़ाली करो कि जनता आती है”। आज जनता का सरकार के नीतियों का विरोध करना मुश्किल हो गया है। पिछली कई सरकारें भ्रष्टाचार में लिप्त रही हैं। कई दल प्रायोजित विरोध कराती हैं।राज्य या देश की चुनी हुई सरकार जिस दल की होती है उस दल का एक साधारण कार्यकर्ता भी ख़ुद को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से कम नही समझता। गुंडागर्दी होती है।उदाहरण देना उचित नही समझता क्यूंकि आप सबकुछ जानते ही हैं।

हमारे देश में लोकतंत्र सिर्फ़ सत्ता का खेल बन कर रह गया है। ऐसे में हम दुनिया को लोकतंत्र की कैसी तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं? आज अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस पर हमे कम से कम अपने देश में लोकतंत्र की स्थिति को समझना बहुत ज़रूरी है, इसकी समीक्षा बहुत ज़रूरी है। उम्मीद है आने वाले वक़्त में हम लोकतंत्र की सही तस्वीर दुनिया को दिखा सकेंगे। अब्राहम लिंकन ने जो कहा वो सच होगा। लोकतंत्र की जो कल्पना की गयी थी, वो सिर्फ कल्पना नहीं बल्कि हक़ीक़त बनेगा। और भारत उसका उदाहरण बनेगा। जय हिन्द! 

Comments

Swati's Blogg said…
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Swati's Blogg said…
बहुत हीं बेहतरीन और बिल्कुल सही बातें लिखा है। उम्मीद है बदलाव आए और हम लोकतंत्र की सही तसवीर अन्य देशों के सामने रख सकें।
Archana Kishore said…
बातें एकदम सही लिखी गई हैं.. उम्मीद है, हालत बदलेंगे..
SARITA said…
बहुत अच्छा लेख है। आज लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रही है। लोकतंत्र एक दिखावा मात्र रह गया है। चुनाव में किसी खास गुंडे के पक्ष में गरीब वंचित बस्तियों को डरा धमका कर वोट कराते हैं एसा ना करने पर उन्हें बरबाद कर देते हैं। हम अंग्रेज को दोषी मानते हैं उन्होंने तो हमें जीवन जीना सिखा दिया है वरना मार लंगोटी, हाथ में बोटी। जिसकी लाठी उसी की भैंस । ना कानून ,ना कोई वयवस्था, बस चार वर्ण की बात होती, कोई विरोध करता तो घूँसा-लात होती। सीधी मौत से मुलाकात होती। चर्चिल की सोच को नमन।