सबकुछ असाधारण हीं तो है।

  

आसमाँ की लालिमा के बीच जब सूरज बादलों के दामन से झाँकता हुआ, अपनी छटा से मंत्रमुग्ध करता हुआ, क्षितिज पर चढ़ने को तैयार हुआ, जलाशय में खड़े श्रद्धालुओं के बीच उमंग और उत्साह की लहर स्वतः प्रसारित होने लगी। नभ के अप्रतिम नज़ारे के बीच चढ़ते सूरज को अर्घ्य दे कर चार दिवसीय छठ पूजन का समापन हुआ। मेरी नज़र जिस इंसान को देखती, सब की आँखों में एक संतुष्टि और चेहरे पर होठों के सबसे खूबसूरत कोण के साथ ख़ुशी की झलक तैरती हुई प्रतीत होती थी। सकारात्मक ऊर्जा हर कोने से हर कण से हर जन में स्फूर्ति डाल रही रही। ऐसा लग रहा था मानो इस सुबह की शुरुवात के साथ सृष्टि के प्रसव से नई खुशियाँ, संसार को बीते दिनों के तकलीफ़ से मुक्त कराने, अवतरित हो चुकी हैं। रेत से कलाकारी कर श्री गणेश की प्रतिमा जो अशोक कुमार जी ने बनाई थी, उस प्रतिमा में भी एक मुस्कान ना जाने कब उभर आई। अद्भुत दृश्य था, अद्भुत।


इन सब के बीच एक सवाल, 'कोरोनकाल में एक जगह भीड़ एकत्रित होना किस स्तर तक सही है?' , पिछले कुछ दिनों से मेरे सोच में अपना घर बना कर लगातार परेशान कर रहा था। उसका जवाब तो नही मिला लेकिन जनता और प्रशासन की सजगता ने इशारों में हीं कई रास्ते ज़रूर दिखाएं। पिछले एक महीने में ऐसे कई अवसर रहें जब शहर में भीड़ आम बात रही। राजनीतिक सभाएं, रैलियां, चुनाव प्रचार, नामांकन, चुनाव, धनतेरस, दीवाली, छठ पूजा की खरीदारी और घाटों पर छठ पूजा में भीड़ का आना स्वभाविक था।

केंद्र तथा राज्य सरकार के नेतृत्व में स्थानीय प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन के लिए जो तरीका अपनाया वो अकल्पनीय तरीके से कारगर साबित होता दिख रहा है। आशंका ये भी थी कि चुनाव के बाद कोरोना का प्रसार बढ़ेगा। कटुसत्य ये भी है कि हमारा शहर और आसपास का क्षेत्र ऐसा है जो उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। ऐसे में कोरोना अपना विकराल रूप ले सकता था। फ़िलहाल आंकड़ों की माने तो पूरे जिले में 104 सक्रिय मरीज़ हैं।

1 नवंबर को माननीय प्रधानमंत्री जी ने हवाई अड्डे पर विशाल जनसभा को संबोधित किया। भीड़ तो ज़बरदस्त रही मगर व्यवस्था लाजवाब। सामाजिक दूरी का पालन तथा मास्क का प्रयोग अनिवार्य था। लोगों की जागरूकता कहें या डर, इस बार प्रशासनिक नियमों का पालन सभी ने किया। शायद विकल्प की कल्पना सभी के रचनात्मक सोच से परे था। प्रधानमंत्री जी के निर्देशों की अवहेलना कर उन्हें सुनने की उत्सुकता रखना भी ज्यादती ही होती। 

03 नवंबर को शहर के लोगों ने लोकतंत्र का पर्व अब तक के इतिहास में सबसे विचित्र तरीके से मनाया। स्थानीय प्रशासन ने प्रत्येक मतदान केंद्रों पर मतदाताओं का मास्क पहनना अनिवार्य कर रखा था, मतदान भी ज़रूरी है और सुरक्षा भी। सभी मतदाताओं का थर्मल स्क्रीनिंग भी हुआ।  सैनिटाइजर तथा हस्तत्राण की व्यवस्था भी थी। इनका प्रयोग भी मतदान का उतना हीं अभिन्न हिस्सा बना जितना उँगली पर स्याही का निशान। सामाजिक दूरी के अनुपालन के लिए विशेष व्यवस्था थी। ऐसा बहुत कम होता है जब आम जनता प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों से खुश होती है। यह ऐसा हीं एक असाधारण अवसर था।

ख़ैर, प्रशासन अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश तो कर ही रही है मगर वक़्त वक़्त पर जनता असजगता की नींद में भी खोने लगती है। धनतेरस और छठ पूजा की खरीदारियों के बीच लगभग एक हफ़्ते बाज़ार में जिस तरह सामाजिक दूरी की धज्जियाँ उड़ाई गयीं वो अत्यंत विचारणीय है। नियम एवं कानून की खिल्ली उड़ाते लोग जिस प्रकार कोरोना को खुला आमंत्रण दे रहे थें वो देख दिल के एक कोने में दर्द का आभास होता रहा। ये लापरवाही किसी बड़े ख़तरे को जन्म ना दे दे।

सर्दी का मौसम दस्तक दे चुका है और साथ हीं साथ विवाहों का मौसम भी शुरू होने को है। मांगलिक कार्य आरंभ होंगे और साथ हीं आरंभ होगा भीड़ का एकत्रित होना। पटाख़ों के शोर फिर सुने जाएंगे, जश्न मनेगा और प्रदूषण हँसेगा। कोरोना दबे पांव , शरारत करता हुआ, एक अल्पविराम के बाद, मुस्कुराता हुआ नए नए शिकार ढूँढेगा। विशेषज्ञों की मानें तो बिहार कोरोना के दूसरे लहर से कुछ हीं कदम पर खड़ा है। निर्णय आपका होगा, सावधानी या परेशानी। जिस प्रकार घाटों पर आपने सजगता दिखाई, उम्मीद करता हूँ आने वाले सबसे कठिन दौर मेंं आप उसी बुद्धिमत्ता का उचित परिचय देेंगे। खुशियों का शंखनाद हो चुका है। आईए मिलकर इस युद्ध में विजयप्राप्ति के साथ सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करें।

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