कल रात की कहानी।



कल रात रेडियो पर गीत सुन रहा था, पुराने नग़मे। मज़ेदार घटना घटी। पहला गीत "अजीब दास्ताँ है ये.... न वो समझ सके न हम"। यादों की पोटली से ख़्याल उछल उछल कर बाहर आ रहे थें। मेरे प्यार की दास्ताँ मेरे सामने खड़ी होती दिखी। वो मेरी खुशी थी और मैं उसका दर्द। अजीब दास्ताँ थी। सच में न वो समझ सके कि वो मेरी खुशी है ना मैं समझ सका मैं उसका दर्द। वक़्त की चोट खा कर समझ आयी मगर हमेसा की तरह देर हो हीं गयी। "मुबारकें तुम्हें कि तुम किसी के नूर हो गए... (हम)किसी के इतने पास थे कि सबसे दूर हो गए...।

अगला गीत तो और भी माज़ेदार था। मेरी ज़िन्दगी की सच्चाई बताता हुआ। "आवारा हूँ.... आवारा हूँ"। अब क्या कहूँ इस गीत के बारे में? "आबाद नही... बर्बाद सही... मुझसे किसी को प्यार नहीं... मुझसे किसी को प्यार नहीं"। मेरी ज़िन्दगी बर्बाद तो हर तरीके से है। और प्यार? प्यार तो किसी को है हीं नहीं। मैं जियूँ या मर जाऊं, किसी को फ़र्क़ नही पड़ता। मेरी तकलीफें हवा की तरह है जो हर जगह मौजूद है मगर किसी को दिखती नही। मेरी ख़ुशी मायने नही रखती। "दुनिया... दुनिया मैं तेरे तीर का या तकदीर का मारा हूँ.... आवारा हूँ"।

फिर आयी बारी मेरे सबसे पसंदीदा गीत की, जो अक्सर मुझे सुकून देती थी। मेरे दोस्तों को पता है ये गीत मैं दिन भर सुनता रहता था, ना जाने क्यों? अब जानता हूँ। ये गीत मुझे अतीत में मेरे वर्तमान को परिभाषित करता था। "तुम....पुकार लो"। हेमंत कुमार की मधुर आवाज़ में जो सुकून मिलता था, अब दर्द बन चुका है। "तुम्हारा इंतज़ार है... तुम.. पुकार लो"। मैं जानता हूँ उसके ज़ानिब से कोई आवाज़ नही आएगी। और यही बात सुकून को दर्द में तब्दील करता है। इंतज़ार बेकार था। "ख़्वाब चुन रही है रात, बेकरार है... तुम्हारा...इंतज़ार है"। मैं फिर से इंतज़ार करने लगा हूँ मगर जनता हूँ, हासिल कुछ भी नही होगा।

गीतों का सिलसिला चलता रहा और उसकी याद कुछ ज्यादा ही आने लगी। तभी अचानक सुना ये गीत। "चलो एक बार फिर से... अजनबी बन जाएं हमदोनो"। वैसे अब अजनबी बनने जैसा कुछ भी नही रहा। अजनबी तो थें हीं हमदोनो हमेसा से। ना मैं उसे पहचान पाया कभी ना वो मुझे जान पाई। "ना मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की, ना तुम मेरी तरफ देखो ग़लत अंदाज़ नज़रों से"। उसकी बेरूख़ी, उसकी ख़ामोशी, उसकी नफ़रत, ..... सब... सब बर्दाश्त के दायरे से बाहर है। उससे नज़र मिलती भी है तो लगता है गुनाह हो गया। "चलो एक बार फिर से...अजनबी बन जाएं हमदोनों"।

अगले कुछ गीत मैं सुन नही पाया। ध्यान अजनबी बनने पर लगा था। उसकी यादों में काफी देर तक खोया रहा। रोता रहा। जब सब फिर से सामान्य होने लगा तो धीरे धीरे अगले गीत की आवाज़ कानों तक पहुँचने लगी। "आज फिर दिल ने, एक तमन्ना की, आज फिर दिलको, हमने समझाया"। क्या कहूँ अब। "तुम चले जाओगे तो..सोचेंगे.... हमने क्या खोया, हमने क्या पाया.... ज़िन्दगी धूप, तुम घना साया..."। वो जा चुकी है😔। मैनें खो दिया है उसे। "हम जिन्हें गुनगुना नही सकतें, वक़्त ने ऐसा गीत क्यों गाया"। तकलीफ़ अपने चरम पर पहुँचने लगी। आँखों से उसका चेहरा ना ओझल होता ना दिल में तम्मनाओं का उफान शाँत होता। आँखों से आँशुओ का समुंदर निकल आया। 

अगला गीत कौन सा था, क्या था मुझे कुछ याद नहीं। शायद आँख लग गयी होगी। अभी उठा हूँ तो सोचा लिख ही लूँ, शायद दिल हल्का हो जाये। मगर अब दिल कभी शाँत नही होगा। ज़िन्दगी अपनी रफ़्तार से बढ़ती रहेगी। "चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला".. अब ये गीत दिमाग में गूंज रहा है। "तेरा कोई साथ ना दे तो तू ख़ुद से प्रीत जोड़ ले,.... पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहाँ है खेला, चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला"।

Comments

Hajari A. Prajapati said…

अब वो भी जीके थक गए हैं, अब मैं भी मर के थक गया हूं।
वो हमसफर न सही, हमारे सफर जरूर बन गए।